Thursday, 11 April 2013

धुध्लाते जज्बात

धुध्लाते जज्बात...



ये कैसी अफ़रा-तफ़री ये कैसी रफ़्तार है


हर एक को है अपनी ही जल्दी यहाँ


हर एक की है अपनी मंज़िल यहाँ ,


है हर कोई अपने में मगन यहाँ


क्यों करे कोई और किसी के लिए जतन यहाँ ,


नहीं करता कोई किसी का इंतज़ार यहाँ


नहीं करता कोई किसी से प्यार यहाँ,


है हर कोई अपना ही मीत यहाँ

लबों पे थिरकता खुद का ही गीत यहाँ ,

कहाँ खो गया वो सुकून जिसका सबको इंतज़ार है

कहाँ है वो हसीं शै जिसे सब कहते इंसान हैं ,

हर एक का है अपना मतलब यहाँ

नहीं इंसानियत की है पहचान यहाँ ,

नहीं जानते दिल और दिलों की बातें

बस एक मकसद ही है सबको आम यहाँ ,

ये कैसी जगह जी रहे हम जहाँ कहने को अपनों का अम्बार है

ये कैसा बदलाव है दोस्तों ये कैसी रफ़्तार है

दीप

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