Friday, 11 July 2014

अब खुद के लिए जीना है...

क्यों मेरा अस्तिव है आज मुझे पे भारी
भैया कि हॅसी तो थी अम्मा को प्यारी
अम्मा के आँचल के छाव में भी हैं बारी

क्यों मेरा अस्तिव है आज मुझे पे भारी
जन्म से अपने ही लोगों के बीच घिरी हूँ
घर गृहस्थी के नाम पर दबायी गई हूँ
टूटे अक्षरों में मैंने अपनी पहचान बनाना क्या सिखा
समाज़ और अपनों की  नजऱों में खटकने लगी हूँ
मेरी जिंदगी से बोझल हुई मेरी किताबें सारी

क्यों मेरा अस्तिव है आज मुझे पे भारी
जानने लायक़ हुई तो शरीर पर पड़ती
हवस भरी भूखी नजरों को पहचाना
कभी छू कर  तो कभी आँखों से
होता हैं यहाँ हर पल बलात्कार ये जाना
मेरी सुरक्षा मेरे भविष्य की गुहार देते
प्रथा के नाम पर अनजाने रिश्तों में बांध देते 
आज़ फिर से मेरी भावनाओ को बिना सोचे
बिना समझे मुझसे बिना पूछे जैसे बेच दिया
ये कैसा स्नेह है पापा , माँ ये तेरी कैसी ज़िम्मेदारी

क्यों मेरा अस्तिव है आज मुझे पे भारी
आज़ मेरी नन्ही सी उम्र का वो एक अहम् पड़ाव पार हुआ
पहली रात से शुरू, मेरा जिस्म हर रात तार तार हुआ
मुझे झंझोड़ा गया, मुझे जिंदगी के हर मोड़ पर बस तोडा गया
कभी खुद को जन्म देने पर तो, कभी दहेज़ की ख़ातिर जलाया गया
बहुत सह लिया मैंने, तब अपनी बच्ची के लिया आवाज़ उठाई मैंने
भरी अदालत में अपने सिवा और किसी को ना साथ पाया मैंने
बंद कमरों में तो नोचा ही गया था अभी तक ,
अब बीच समाज़ हैं चीर हरण की तैयारी

क्यों मेरा अस्तिव है आज मुझे पे भारी
पर हार मानी टूटे शरीर, बिखरे हौसलों को समेटा मैंने
अपने मान अपनी पहचान को हर कैद से छुड़ाया मैंने
कल जिस साथ के बिना मन में छिड़ थी हमेशा नाउम्मीद थी
आज उसी अकेलेपन को अपना आत्मविश्वास अपना आत्मबल बनाया मैंने
अब और नहीं होगा मेरा अस्तिव मुझे पे भारी
अब अपने सपनों को जी लेने की हैं बारी


दीप 

Published in a Hindi monthly magazine' Aagman' 

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