Monday, 9 February 2015

किताब-ए-इश्क़...


किताब-ए-इश्क़ की पढ़ कर हमारे साथ..., भूल गए तुम तो...,

फिर भी ना कोई शिक़वा ना कोई गिला किया तुम से हमने...

जो पूछा किसी दोस्त ने किस्सा मेरे दास्तान-ए-मौहब्बत का...,

बस दिल से एक चिराग़ जलया और फिर खुद ही बुझा दिया हमने...!!!

दीप 

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