Sunday, 22 May 2016

मान ....


पहचान एक छुपी हुई रखती हूँ...,
तूफान छुपे हज़ारों अंदर,बाहर शांत हूँ...!

अपने दोस्त की खुशियाँ को रख के तराजू में...,
 अपनी जान मैं दूसरे पलड़े में रखती हूँ...!

कुछ नहीं माँगा रब सेतो भला क्या माँगू बंदों से...,
शान नवाबों सी ,मुफलिसी में भी मैं आम रखती हूँ...!

ज़मीर को ज़िंदा रख कर, मुर्दों की इस बस्ती में...,
उसूलों का तेरे मैं मान रखती हूँ, ऐ जिंदगी...!!!

दीप 

3 comments:

  1. Nice thought and way of expression.

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    1. Thank you Jyotirmoy...glad you like my pen work :)

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  2. Nicely woven, felt nice reading the same. Keep writing :)

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