Sunday, 5 November 2017

आबाद है...





तेरी याद-ए-गुलिस्तां.., दिल में...,
वर्ना ये दिल भी कहाँ आबाद है...!

नक़्श-ए-क़दम हैं..,तेरे दिल की ख़ाक पर...,
ऐसा कौन रफ़ीक़ है.., यहाँ आबाद है..!

 रोए दिल यार ए जुदाई पर...,
हर्फ़-ए-एहसास...,संग तू ही आबाद है...!

न होना है..,तेरे बिन मेरे होने का...,
एक बिन जली आग से..,धुआँ आबाद है..!

 रौनक़-ए-दिल का है...,आलम है दीवानगी..,
जिंदगी में क्यो...,ख़ाना-ए-आवारगाँ आबाद है..!

उस गली में..,आज तक इक दरीचा है...,
बे-निशाँ.., बे-चराग़..,हम आबाद है...!!!

दीप

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