Thursday, 11 June 2015

मेरी ज़ात...


तोड़ दिया उन्होंने...हर तालुक मेरी जो ज़ात से...,
ना जाने वो ख़फ़ा मेरी किस बात से है...!
ना उलझे कोई कुछ इस तरह -ख़ुदा...,
जो हो कोई वाकिफ़ तेरे ज़ज़्बात से...!
किस तौर जिए कोई रूठ कर इस कदर...,
ये साँसे तो बावस्ता है उनके ख़याल से...!
जुड़े है तलूक-का-दिल कुछ इस तरह...,
जुड़ा है इंसान खुद अपने आप से...!!!


 दीप 

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