Monday, 15 June 2015

मेरा वज़ूद...

  
कुचल गया मेरा वज़ूद ना जाने क्यों...,
 वो जो हबीब था...बस बदल गया...!

ना जाने किस की हर्फ़--दुआ थी...,
जो में गिर कर संभल गया...!

जब कभी तेरी याद ने सताया...,
मेरा दर्द--दिल...कुछ बेहाल गया...!

मेरी किस्मत का काफ़िला...,
ना जाने क्यों किसी और की जानिब निकल गया...!

ताकते थे...उन्हें बेवजह-बेसबब...,
अनजाने ही मेरा अनकहा ख़्वाब मचल गया ...!

मैं हर तरह मजबूत था ...,
ना जाने क्यों...तेरे आगे यू पिघल गया...!!!


दीप

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