Saturday, 21 March 2015

पूनम का चाँद...


ये पूनम का चाँद और इसकी चमकती हुई चांदिनी,
आज फिर से याद दिला जाते हैं।
तुम्हारे और मेरा प्यार का वही अनकहा बंधन।
अभी कल की सी बात लगती है,

जब तुमने मेरा हाथ थम कहा था 'तुम मेरी ही तो हो,
फिर कुछ वक़्त की दुरी क्या मायने रखती है,
साये सा साथ निभाऊंगा,ये मेरा वादा है।
तुम्हारी उन बातों को सुन कर,
मेरी सुनी सी जिंदगी में आई वो बहार,
आज भी ज़ेहन में उतनी ही खूबसूरती से ताज़ा है।

सच कहुँ तुम एक साया ही तो थे ,
जो गुमनाम अँधेरा होते ही राहों बदल साथ छोड़ गया,
और मैं बुनती रही ख्वाब सब कुछ भुलाए बस, तुम्हारे लिए,
गलती ना कहूँगी पर ऐसे कब तक सहूंगी,
तुम ही बता दो इस दर्द नागवार संग कब तक जियूँगी,
आज सोच अपनी को थोड़ा मरती हूँ, ये सोच कभी जिया था तुम्हारे लिए

देखो आज़ फिर ये वही पूर्णिमा का चाँद तो है, और इसकी चांदिनी भी,
पर ना जाने क्यों तुम  वो ना रहे
मेरा क्या है ,मै तो मेरी हो कर भी मेरी ना रही,
क्योकि मै तो सदा से जो तुम्हारी ही रही

दीप

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