Wednesday, 4 March 2015

बदले हुए चलन से ...


तेरे लहजे की तलखियत से...क्यों अक्सर परेशान रहती हूँ...,

मौहब्बत की इस तर्ज़ से...मैं क्यों  परेशान रहती हूँ...,

पल दो पल के चैन से भी...मैं क्यों मोहताज रहती हूँ...,

अपनी ही हालते रूह से...मैं क्यों अक्सर परेशान रहती  हूँ...,

रोज़ उदासियो के साथ  जाने हर शाम आती है...,

कशमकश में कुछ इस तरह...मैं परेशान रहती हूँ...,

तुम तो गए पर तेरी यादें गयी है...अब तलक..,

मैं अब भी तेरी यादों के इन काफिलों से...परेशान रहती हूँ...,

कभी तो कोई थम ले... इन ही उमीदें तो रवां रहती हूँ...,

फिर अगले ही पल...अपनी ही उमीदों से परेशान होती हूँ...,

अँधेरी काली रातों में...,तारों के शमिअनों में...,

मेरे ही ख्वाबों के अंजुमन मैं...,

ना जाने क्यों मैं सो नहीं पाती...मैं परेशान रहती हूँ...,

बदले बदले से अच्छे नहीं तेवर...तुम्हारे भी आजकल...,

तुम्हारे इस बदले हुए चलन से...मैं अक्सर परेशान रहती हूँ...।।।

दीप

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