Tuesday, 16 December 2014

मुक़द्दर मेरा...



एहसास की मेरे कुछ सिमट जाए तो अच्छा...

रात आँखों ही आँखों में कट जाए तो अच्छा...,

नहीं मेरी नींद की बाँहों में न तू, न तेरे ख़्वाब...

अब ये नींद भी आँखों से उचट जाए तो अच्छा...,

अब तक तो साथ रहा मुक़द्दर मेरे...

जिंदगी बाक़ी भी चैन से कट जाए तो अच्छा...!!!

दीप 

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